Hindi foundational learning

From Karnataka Open Educational Resources
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        तृतीय भाषा के उद्देश्य

1. सभी स्वरों, व्यंजनों, मात्राओं और व्याकरण के मूलभूत मुद्दों का पुनरावर्तन करना

2. कहानी, कविता और एकांकी का सही उच्चारण के साथ अर्थपूर्ण पाठन

3. उपलब्ध विषय सामग्री को समझना

4. विषय-सामग्री से संबंधित प्रश्नों के मौखिक और लिखित उत्तर दे पाना

5. शब्दावली को समृद्ध करना


६. रोचक गतिविधियों और खेलों से भाषा का रसास्वादन करना चुनौतियाँ - बच्चों की रुचि बच्चों का पाठशाला के अतिरिक्त कहीं भाषा से सम्पर्क न होना विषय के रूप में पढ़ना परीक्षा के लिए - बच्चों की सोच और अध्यापकों की सोच बच्चों में समझ के अलग-अलग स्तर होना बच्चों की संख्या अधिक होना- खेल विधि और अन्य पाठ्योत्तर गतिविधियाँ लेने में कठिनाई बच्चों के द्वारा किए गए कक्षा कार्य और गृहकार्य का मूल्यांकन और उस पर व्यक्तिगत टिप्पणी देने में कठिनाई विस्तृत पाठ्य सामग्री की वजह से भाषा के प्रति रुझान जागृत करने में कठिनाई उपलब्ध समय में पाठ्यसामग्री पूरी करना और रुचि भी कायम रखना पाठ्यसामग्री के साथ किस प्रकार से पाठ्यक्रम के अलावा विषयवस्तु पढ़ने का बढ़ावा और अवसर प्रदान करना बच्चों को स्वावलम्बी बनाना और आत्म शिक्षण की ओर प्रेरित करना

प्राथमिक, माध्यमिक कक्षाओं और कक्षा आठ में सेतुबन्ध कक्षा आठ में हिन्दी तृतीय भाषा लेते समय याद रखा जाए कि प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं में पढ़ाई गई पाठ्य सामग्री को अवश्य दोहराया जाए। इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ेगा क्योंकि पुन:स्मरण इस संबंध में मदद देगा और अध्यापक को भी बच्चों का स्तर पता चलेगा जिससे वह पाठ्य-पुस्तक पढ़ाते समय उन मुद्दों पर ज़ोर दे सकेगा । हमें याद रखना चाहिए कि पुनरावृत्ति का अपना अलग स्थान है किसी भी चीज अथवा विषय को सीखने में । इस सेतुबन्ध की शुरुआत इस प्रकार से कर सकते हैं- १. किसी विषय पर बोलने का अवसर प्रदान करना जैसे- अपना परिचय, अवकाश के बारे में । मातृभाषा अथवा अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग का अवसर बोलने से समय दिया जाए । गल्त वाक्य को ठीक करके बोलने को कहा जाए। बच्चे के एक वाक्य बोलने पर भी उसकी प्रशंसा कर उसका उत्साह बढ़ाया जाए। बातचीत के दौरान यदि महीने, दिन, सब्ज़ी, फल, परिवार आदि विषय आएँ तो उन पर भी चर्चा की जाए।

२. मौखिक रूप से हिन्दी वर्णमाला का पुनरावर्तन- स्वर, व्यंजन श्यामपट पर लिखाना

३. स्वरों से ही सार्थक शब्द बनाने को कहना ४. व्यंजन से दो, तीन और चार अक्षर वाले शब्द बनवाना

6. स्वर के कार्य- स्वर रूप में और मात्रा के रूप में - अ स्वर की मात्रा की व्याख्या अवश्य करना

7. बारहखड़ी- अभिनय से मात्रा को समझाना और लगवाना व्यंजन में

8. ऋ मात्रा की व्याख्या और कौन-से अक्षरों में नहीं लगती इस पर ध्यान दिलवाना

9. हर मात्रा के शब्द बताने को कहना- पहले अक्षर में , बीच के अक्षर में और अंतिम अक्षर में जैसे- काम, बनाई, बनाना । दिन, लिखित, तटिनि। मील, वजीर, बकरी। गुम, बथुआ, तालु। फूल, मामूली, तराजू। मेला, सवेरा, बकरे। कैसा, कसैला। कोठी, सलोनी, ओढ़ो। कौआ, खिलौना, समझौता। रंक, चुकंदर। दु:ख, अत: । सूँड, ताँगा, सहेलियाँ। र में उ और ऊ मात्रा- रु- रुमाल, गुरुजी । रू- रूलर, रूपा। हर व्यंजन से कम से कम दो शब्द बताने को कहना । इन गतिविधियों से शब्दावली बढ़ेगी और समझ भी। खेलों से इस गतिविधि को कराया जाए। 10. र के चार रूप- र- रमेश, राम, पदेन र- क्रम, प्रथम, पदेन र टवर्ग में- ट्रक, ड्रम , रेफ र- बर्फ, कर्म ।

10. ड और ड़- डाली, डराना, डायरी, डमरू, डग, निडर (शब्द के आरम्भ होने पर बिन्दी नहीं लगती, उपसर्ग के बाद बिन्दी नहीं लगती, अनुस्वार के बाद बिन्दी नहीं लगती जैसे- डंडा, अंडा, अन्य भाषा के शब्दों में बिन्दी नहीं लगती जैसे रोड, बेडरूम) । पेड़, लड़ना, पहाड़, सड़क, बड़ी। (शब्द के मध्य में और अन्त में भी बिन्दी लगती है) अनुनासिक के बाद भी बिन्दी नहीं लगती है जैसे कि- साँड, सूँड। 11. ढ और ढ़ – ढक्कन, ढलान, ढेर, ढीला, ढपली । पढ़ना, बढ़ई, चढ़ाई, गढ़ना, दाढ़ी (शब्द के मध्य में और अन्त में भी बिन्दी लगती है) अनुनासिक के बाद भी बिन्दी नहीं लगती है जैसे कि- ढूँढना ।

12. अनुनासिक और अनुस्वार- व्यंजन में मात्रा लगी हो और "आ" हो तो चन्द्रबिन्दु लगाते हैं जैसे कि- दाँत, चाँद, सूँड वरना बिन्दी लगाते हैं जैसे कि- ईंट, खींच ।

13. ज और ज़- जानवर, जग,जहाज़, अजगर, राजा, बाज़ार, ताज़ा, गाजर, मेज़, ज़मीन, तरबूज़, ज़हर, ज़रूर, नाज़ुक, दरवाज़ा, 14. फ और फ़- फूल, फीका, फटना, सफल, फलाहार, टेलीफ़ोन, सफ़ेद, सोफ़ा, फ़ोटो, सफ़ाई, फ़ौज, फ़ैशन, फ़ायदा, फ़्रेम, फ़िल्म

15. आधे अक्षर और संयुक्त अक्षर- श + र=श्र, त+र= त्र, क+ष= क्ष समान संयुक्त अक्षर- क्क, ग्ग, च्च, ज्ज, ड्ड, त्त, द्द, न्न, प्प, ब्ब, म्म, य्य, ल्ल, व्व, स्स। असमान संयुक्त अक्षर- क्ख, ग्घ, च्छ, त्थ, द्ध, स्क, म्ह, ग्व, ब्ज, प्य ।

१६. पाँचवाँ वर्ण-

   कवर्ग- ङ- रंक, पंख, पंगा, कंघा
   चवर्ग- चंचल, पंछी, पंजा, झंझट
   टवर्ग- टंटा, ठूंठ, डंडा, पंढर
   तवर्ग- तंतु, पंथ, सुंदर, धंधा
   पवर्ग- पंप, गुंफन, बंब, खंभा

16. हृस्व और दीर्घ स्वर और व्यंजनों का उच्चारण- बात/भात, गास/घास, काना/खाना, गर/घर आदि ।

17. है, हैं, हूँ और हो का प्रयोग

18. ओर और का प्रयोग

19. मैं, हम, आप, तू, तुम का प्रयोग

20. यह ये वह वे का प्रयोग

21. इसका, इनका, उसका, उनका, मेरा, हमारा, उसे, उन्हें, इन्हें, जिन्हें, किन्हें, किसी, कोई, मुझे का प्रयोग

22. क्या कौन कहाँ प्रश्नवाचक शब्दों का प्रयोग

23. यहाँ वहाँ बड़ा छोटा क्रियाविशेषणों का प्रयोग

24. में पर, दूर पास, के अंदर के बाहर, के ऊपर, के नीचे संबंधबोधक शब्दों का प्रयोग

25. को के लिए का के कि की विभक्तियों का प्रयोग।

26. वचन

27. संज्ञा

28. पुलिंग स्त्रीलिंग। संज्ञा शब्दों के स्त्रीलिंग और पुलिंग का भी ज्ञान देना जैसे कि- राजू का टमाटर, रानी की मेज़, राम के अंगूर ।

29. समानार्थक शब्द

30. विलोम अथवा विरोधार्थक शब्द

31. विशेषता बताने वाले शब्द अथवा विशेषण और उनके लिंग के बारे में बात करना

32. क्रिया और हिन्दी के वाक्य में क्रिया पहचानना

33. क्रिया का समय अथवा काल । तीन मुख्य कालों का वर्णन और उनकी पहचान

34. विराम चिह्नों का प्रयोग- खड़ी पाई, प्रश्नवाचक चिह्न, विस्मयादिबोधक चिह्न, अल्प विराम

35. सही वाक्य बनाना अथवा शब्दों के सही क्रम के साथ

36. अशुद्ध वाक्य शुद्ध करना

37. गिनती मौखिक रूप से १०० तक

38. कर्त्ता और कर्म की जानकारी

39. काल परिवर्तन और वाक्य परिवर्तन (वर्तमान से भूत, भूत से भविष्य, साधारण सेप्रश्नवाचक वाक्य, साधारण से विस्मयादिबोधक वाक्य)